कस्टडी में आरोपी द्वारा दिए बयान के आधार पर एनएसए नहीं लगाया जा सकता : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली (विशेष संवाददाता)। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में संभल में हुई हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत की गई कार्यवाही को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान एनएसए के तहत निरुद्ध करने का वैध आधार नहीं बन सकता। हालांकि अफरोज पर तकरीबन एक दर्जन मामले दर्ज हैं। जो लंबित भी है। इसलिए संभल हिंसा मामले में जमानत मिलने के बावजूद वह अभी जेल से बाहर नही आ सकता।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले को खारिज करते हुए अफरोज को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने मामले में राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया, जिसका भुगतान एक महीने के भीतर करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने कहा कि पुलिस के समक्ष दिए गए बयान को स्वतंत्र और विश्वसनीय आधार नहीं माना जा सकता तथा ऐसे बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को एनएसए के तहत हिरासत में रखना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में राज्य सरकार को अनेक अधिकार प्राप्त है, फिर राज्य सरकार के अधिकार किसी की व्यक्तिगत आजादी को कम करने की इजाजत नही देता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि अफरोज की जमानत के बावजूद उसे एनएसए के तहत हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। मामले में अदालत ने राज्य सरकार को पूर्व में याचिका दायर करने का निर्देश दिया था और हिरासत की अवधि समाप्त होने वाली थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एहतियाती हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल कानून के निर्धारित दायरे में ही किया जाना चाहिए और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए ठोस तथा वैध आधार आवश्यक है।
